द अनटचेबल्स


भारत की अछूत जातियों
का आज भी शोषण किया जा रहा हैं। आज हम सन् 2022 में जी रहे हैं लेकिन आज भी लोगों के बीच छुआछूत जैसी हीन भावना ख़त्म नहीं हुईं हैं। क्योंकि इन मानसिक विकलांगता को बनाये रखने में उनके वर्ग का फ़ायदा छुपा हुआ है। किसी व्यक्ति के आचरण को उसका अथवा उसके वर्ग का स्वार्थ अन्दर से बाँध देता है। उसकी बृद्धि भी उसी के अनुसार कार्य करती है। इसलिये स्वाभाविक है कि प्रत्येक ब्राह्मण अर्थात हिन्दू समाज का बौद्धिक प्रतिनिधि- चाहे वह रूढ़िवादी विचार का हो, प्रगतिशील हो, पुरोहित अथवा गृहस्थ हो, पंडित या अन्य कोई हो, उसका स्वार्थ इस बात में छुपा हुआ रहता है कि समाज में उसका स्थान सदैव सर्वाच्च बना रहे। ब्राह्मणों में यदि कोई क्रान्तिकारी समाज सुधारक पैदा हो जाये तो वह उस सभ्यता के लिये निश्चित ही खतरा सिद्ध होगा जिसकी रचना ही समाज में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को बनाये रखने के लिये की गई है। डॉ आम्बेडकर का कहना है कि एक हाथ दूसरे हाथ को कभी चोट नहीं पहुँचाता मगर किसी आक्रमणकारी से उसकी रक्षा ही करता है। इसलिये कोई ब्राह्मण कितना ही शिक्षित एवं क्रान्तिकारी विचार का क्यों न हो  ब्राह्मण वर्ग के हितों के विरुद्ध कभी कार्य नहीं करेगा, किन्तु उनका कहना था कि आश्चर्य तो इस
बात का है कि योरोपीय जानकारों ने भी अछूतों की समस्या पर विचार नहीं किया।
किसी भी व्यक्ति ने ये पता लगाने की कोशिश तक नहीं किया कि अछूत मूलतः कौन थे? अर्थात भारतीय जनसंख्या में अछूतों के पूर्वज कौन थे? भारतीय इतिहास के किस मोड़ पर वे अछूत बन गये? 
डॉ आम्बेडकर के अनुसार आरम्भ में मानव घुमन्तू जीवन व्यतीत करता था। उस समय का सामाजिक संगठन घुमन्तू या कबीला संगठन था। यह वंश एवं गोत्र अर्थात खून के रिश्तों पर आधारित था। शिकार व चारे की तलाश में कबीले एक से दुसरे स्थान पर घूमा करते थे। इनमें शिकार, चारे अथवा पशुओं की चोरी को लेकर अक्सर आपस में लड़ाई हुआ करती थी। 
ऐतिहासिक विकास चरण के इस स्तर पर कृषि का आविष्कार हुआ। कुछ कबीले नदियों व तालाबों के समीप उपजाऊ भूमि पर स्थायी रूप से बसकर खेती करने लगे। एक स्थान पर बसे कबीले के लोग आमतौर पर एक करबीले के होते थे। उन्हें घुमन्तु कबीलों द्वारा आक्रमण किये जाने की बराबर आशंका बनी रहती थी, क्योंकि घुमन्तू कबीले अनाज व पशुओं को लूटने के लिये स्थायी रूप से बसकर कृषि करने वाले कबीलों पर हमला करते रहते थे। इस लड़ाई में जो कबीले परास्त हो जाते थे उनके सदस्य अपनी जान बचाने के लिये इधर-उधर बिखर जाया करते थे, जिन्हें डॉ. आम्बेडकर ने छितरे लोगों (ब्रोकेन मेन) बताया है इस प्रकार हम देखते हैं कि 
उस समय समाज में तीन प्रकार के लोग थे। एक, किसी स्थान पर स्थायी रूप से बस कर खेती व पशुपालन करने वाले परस्पर रक्त संबंधी कबीले, दूसरे वह जो यहां वहां घूम कर जीवन बिताने वाले लोग रक्त सम्बन्थी कबीले और तीसरे' युद्ध में परास्त किसी या किसी कबीले से के विखरे या बिछड़े हुऐ लोग।
पहले वर्ग अर्थात् स्थायी रूप से बसे कवीलों को सुरक्षा की आवश्यकता थी
जबकि तीसरे अर्थात् छितरे हुये लोगों को भोजन की जरूरत थी। इस प्रकार ये दोनों वर्ग एक-दूसरे के पूरक थे। इन वर्गों के लोगों में आपस में समझोता हुआ। जिसके फलरवरूप स्थायी रूप से बसकर कृषि करने वाले कबीलों ने छितरे हुये लोगों को बस्ती
की सीमा पर बसाया। छितेरे लोगों ने भोजन आदि प्रदान किये जाने के लिए 
वस्ती की चौकीदारी स्वीकार कर ली। ये छितरे लोग जो मूल वस्ती से पृथक, वस्ती की चौकीदारी के लिये बसाये गये आगे चलकर अछूत कहलाये।
आम्बेडकर के अनुसार सवर्णों और अछूतों में कोई रंग और नस्ल का भेद नहीं है
और न ही पेशे की भिन्रता।
आरम्भ में छितरे हुये लोग थे, जिन्होंने आगे चलकर बौद्ध धम्म स्वीकार कर
लिया। बस्ती के लोगों द्वारा दिये गये शिकार, भोजन तथा मरे हुए पशुओं जिनमें गाय भी सम्मिलित है, का माँस खाने में उन्हें परहेज़ नहीं था।
आरम्भ में ब्राह्मण सहित अन्य सवर्ण भी गौ माँस खाते थे किन्तु बौद्धों को
आध्यात्मिक पराजय देने की एक सोची समझी चाल के तहत ब्राह्मणों ने माँसाहार छोड़ दिया। गौ माँस भक्षण को उन्होंने महा पाप कर्म निरूपित किया और उस पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया।

बौद्धों के प्रति स्वाभाविक आध्यात्मिक एवं राजनैतिक दुश्मनी तथा घृणा वश
ब्राह्मणों ने गौ मास भक्षण को आधार बनाते हुये छितरे हुये बौद्धों को अपवित्र घोषित किया और उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया। हालाकि धर्म शास्त्रों के समय छितरे हुये बौद्ध अपवित्र करार अवश्य कर दिये गये थे किन्तु वे पूरी तरह से अछूत नहीं थे । अछूत 400 ईसवी के बाद अस्तित्व में आये।


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