भारत में महिलाओं के पतन के लिए ज़िम्मेदार कौन?

समाज में महिलाओं को स्वतंत्रता थी और उसे पुरुषों के समान आत्म विकास के अवसर प्राप्त थे, भारतीय समाज प्रगति पर था, किन्तु जब
महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा हुई, समाज की प्रगति रुक गईं।
स्मृतिकाल ख़ास तौर से मनु के पहले तक भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति अच्छी थी। स्त्रियों को वेद की शिक्षा प्रदान की जाती थी। उन्हें गुरूकुलों में प्रवेश मिलता था। स्त्रियां न केवल वेद मंत्रों का उच्चारण करती थीं बल्कि वेद की अलग - अलग शाखाओं के अध्ययन में बहुत ज्यादा तेज़ थीं। स्त्रियाँ शिक्षक थीं एवं लडकियों को पढ़ाती थीं । विशेष रूपं से धर्म, दर्शन एवं अध्यात्म के ज्ञान में स्त्रियाँ बहुत निपूर्ण थीं। जनक एवं सुलभा तथा याज्ञवल्क्य एवं गार्गी आदि के मध्य संवादों से स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में अनेक ऐसे अवसर आये जबकि स्रियों ने पुरुषों के साथ खुली बहस में भाग लिया।
यह कहना कठिन है कि प्राचीन राज्य-प्रशासन-तंत्र में महिलाओं की क्या
भागीदारी थी किन्तु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्राचीनकाल में देश के बौद्धिक एवं सामाजिक जीवन में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी। अथर्ववेद के एक उदाहरण से स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति उपनयन की अधिकारी थीं और
सामान्यतया ब्रह्मचर्य की समाप्ति के पश्चात ही उनका विवाह होता था में अनेक स्त्रयों का उल्लेख मिलता है जो विद्ष्षी थीं, उन्होंने वेदों और ऋचाओं की रचना की थी।
बद्ध ने समाज में नारी की स्थिति को उठाने के लिये बहुत प्रयास किया। समाज
में शिक्षा व आत्मविकास के अवसर का जहाँ तक प्रश्न है बुद्ध ने नारी एवं पुरुष में भेद
नहीं किया। वे बुद्धि एवं चरित्र में नारी को पुरुष से कम नहीं मानते थे। पुरुषों की भाँति
स्त्रियों को धर्म की दीक्षा, संन्यास अथवा परिख्रजत्व की आनुमति प्रदान कर बुद्ध ने नारी
को पुरुषों के समक्ष धार्मिक अधिकार प्रदान किया। धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिये
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