आज हम वैज्ञानिक जगत में जी रहे हैं लेकिन फिर भी व्यक्ति धर्म, जात-पात, ऊंच-नीच, छुआछूत, असमानता, वर्ण व्यवस्था में उलझा हुआ है। इसका कारण यह है कि व्यक्ति के स्वाभाविक विकास के लिए तीन वस्तुएं अत्याधिक आवश्यक हैं स्वतंत्रता, समानता और सहानुभूति। किसी भी समाज कि नींव अगर इन तीन स्तम्भ से निर्माणीत नहीं है तो उस धर्म के होने न होने से कोई मतलब नहीं। अगर इन तीनों स्तंभों के बगैर कोई समाज या धर्म बनता है तो वह आपस में फूट और अलगाववाद को बढ़ावा देता है इस दोषपूर्ण समाज रचना के पीछे दोषपूर्ण विचारों का हाथ होता है। हिंदू धर्म में इन सामाजिक तत्वों का बहुत ज्यादा अभाव है।
हिंदू धर्म की सामाजिक सन्हिता वर्ण के अस्तित्व को स्वीकार की है और व्यक्ति की उपेक्षा करती है। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति का कोई महत्व नहीं महत्व चार वर्णों का जो कुछ लोगों को ही शिक्षा और ज्ञानार्जन की अनुमति देता है बाकी लोगों को नहीं।
धर्म व्यक्ति के लिए होता है ना कि व्यक्ति धर्म के लिए । धर्म यदि किसी व्यक्ति का सम्मान नहीं करता उसे जानवरों से भी बदतर जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करता है तो वे धर्म नहीं है।
एक भूखे व्यक्ति के लिए धर्म की तुलना में रोटी अधिक महत्वपूर्ण है वेद वेदान्त में स्वर्ग नरक पुनर्जन्म की कल्पनाएं तथा वर्ण और वर्ण के आधार पर व्यक्ति पर थोफ़ा गया कार्य धर्म के लिए नहीं है। जिन्हें जीवन में सब कुछ मिला है। जो भूखे व नंगे हैं जिनकी इस दशा के लिए उनका धर्म उत्तरदायी है उन्हें धर्म से क्या लेना देना ? जो धर्म मानवता की इज्जत नहीं करता वह धर्म नहीं है।
जो धर्म व्यक्ति को महत्व नहीं दे वह धर्म, धर्म नहीं है। यदि दो व्यक्ति का धर्म समान है उनके अधिकार भी समान होना चाहिए न की असमान। एक ही दिन पैदा होने वाले दो व्यक्ति अगर एक उच्च वर्ण के घर पैदा होता है तो ब्रह्मा के मुख से पैदा हुआ माना जाता है और वहीं पर एक व्यक्ति उसी समय उसी नक्षत्र में अगर किसी शुद्र वर्ण में पैदा हुआ है तो उसे अछूत माना जाता है। जाएं तब उसको ज्ञान अर्जन करने की अनुमति मिल जाती है वही दसरे व्यक्ति को चांडाल व दासों वाले कार्य थोप दिए जाते हैं। धर्म जो अपने अनुयायियों में भेदभाव करता है पक्षपाती है। धर्म जो अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ अपराधी और कुत्ते से भी बदतर व्यवहार करता है उन पर असहनीय निर्योग्यता थोफता है बे धर्म नहीं । धर्म इस पकार की अन्याय पूर्ण समाज व्यवस्था की सिफारिश नहीं करेगा धर्म और दासता में मेल नहीं हो सकता।
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