मध्यप्रदेश के दर्पण में एक सच्ची कहानी जात-पात धर्म रोज की अनदेखी आवाज़
सुबह -सुबह भोपाल स्टेशन का सन्नाटा भी किसी उत्सव से कम नहीं होता, भीड़ कुछ ज्यादा होती है शहर चलते हैं गांव जागते हैं और तंगी की शक्ल उम्मीदों का रास्ता टटोलती हैं इसी भीड़ में किसी बच्चे की मुस्कान किसी बुजुर्ग की जर्जर पगड़ी किसी जवान की कट्टी हुई जेब एक कहानी कहती है जिसमें सबसे बड़ा किरदार उसका नाम उसकी जात और कभी-कभी उसका मज़हब होता है
मध्यप्रदेश भारत का दिल है कहने में गर्व जीने में संघर्ष और स्वीकार में सीमाएं यहां नर्मदा का पानी सबको एक जैसा दिखाई देता है लेकिन समाज की बुनावट में पुराने रंग अभी भी कहीं परतों में छिपे हुए होते हैं मुझे याद है गुना जिले के एक गांव में सुबह होने का मतलब था पानी की लाइन में लगना दो हैंडपंप लेकिन एक गांव के लिए दूसरा हरिजन बस्ती के लिए, गांव के स्कूल में आज भी कुछ मास्टर साहब बच्चों का नाम लेकर तय करते हैं कौन आगे बैठेगा कौन पीछे बैठेगा,
मध्य प्रदेश के गुना अशोकनगर राजगढ़ शिवपुरी इन जिलों में दलित बच्चों को मिड डे मील की लाइन में बार-बार टोका जाता है, किसी गांव में एक महिला मात्र इसलिए रसोईया नहीं बन सकी क्योंकि उसके सरनेम से लोगों को ऐतराज था, गुना जिले की गलियों में मैं खुद देख चुका हूं पक्का मकान सामने टूटी झोपड़ी उसके बगल में लेकिन अदृश्य कभी दिखाई ना देने वाली दीवार उनको इतना ऊंचा कर देती है कि बच्चों की पतंगे भी उसे पर नहीं कर पाती भोपाल इंदौर जबलपुर जैसे बड़े शहरों में भी ऊपरी तौर पर सब बराबर सा लगता है लेकिन जैसे ही किराए पर मकान ढूंढने निकले हथेली में मकान मालिक की नजर सिर्फ उसके नाम पर टिकती है उसका सरनेम देखा जाता है रिश्तो के जोड़े में ऑफिस के रजिस्टर में यहां तक की पुलिस थाने तक पहचान का बोझ हर जगह सर उठाए खड़ा रहता है इंदौर में एक डॉक्टर ने बताया मैं बार-बार इंटरव्यू देने जाता हूं सब डिग्री देखते हैं फिर अचानक से कोई सवाल पूछ लेता है कौन जात से हो? शहर के सबसे उंचे मॉल में काम करने वाला सुरेश मानते हैं मेरा नाम सुनते ही मुझे केस काउंटर से स्टोर रूम में भेज दिया गया मध्य प्रदेश में हाल ही में कई सालों में धार्मिक घटनाएं भी खूब चर्चा में रही है कभी गुना, उज्जैन, भोपाल, इंदौर, जबलपुर में मस्जिद के बाहर भीड़ कभी किसी चर्च के बाहर तोड़फोड़ कभी मुसलमानों के खिलाफ अफवाहें मेरा एक दोस्त अहमद बताता है ईद का सतरंगी झूला हो या दशहरा का मेले का मैदान दोनों बराबर भीड़ लाते हैं लेकिन नाम अलग है रंग लगे मज़हब अलग है मंदिर में भजन मस्जिद में अज़ान शहर की फिजा में सब घुला सा लगता है लेकिन मोहल्ला बदलते ही बातों में अलगाव आ जाता है मध्य प्रदेश के स्कूलों में आज भी कई बार दलित बच्चों को अलग बैठाया जाता है यह सरकारी आधे से लेकिन गांव की रेट अलग होती है
पंचायत चुनाव के वक्त गांव का जमावड़ा सबसे पहले किस समाज के लोग लड़ेंगे तय करता है हरिजन के घर में शादियां 3 दिन पहले कराई जाती है ताकि गांव के बड़े लोग शादी में ना बुलाया जाए उम्मीद की एक सुबह में जब अशोकनगर जिले गया था बाय छोटे से बच्चे ने सवाल किया भैया क्या मेरा नाम सुनकर भी कोई दोस्त बन सकता है मुझे ऐसा लगा जैसे पूरा प्रदेश अपने उन्होंने कई शब्दों में बोल उठा क्योंकि यहां जाट भी सवाल है और धर्म भी तौहीन जहां मुस्लिम कारीगर अपने हुनर से पूरे मोहल्ले को इरफान भाई बना देता है वहीं अगले चौराहे पर बस में बैठने के लिए पर्स टटोलते हुए मन में एक डर बना रहता है कि कहीं कोई भी गलत पहचान ना पूछ ले मध्य प्रदेश आज शिक्षा में तेजी से बढ़ रहा है आईटी और ट्रांसपोर्ट में दुनिया देख रहा है किंतु समाज की परतों में अभी भी बहुत कुछ छुपा हुआ है कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में फॉर्म भरते वक्त जब लड़के लड़कियों के जाति/धर्म का कॉलम भरने को बोला जाता है तो लैपटॉप की स्क्रीन पर इस तरफ और गांव के पक्के मकान की दीवार के उसे तरफ बड़ी कड़वाहट छुपी रहती है कास्ट और रिलिजियस के आधार पर की जाने वाली राजनीति में समाज के रिश्तों में खटास और बढ़ा दी हैं ग्वालियर भिंड रीवा बालाघाट मंदसौर जिले में सैकड़ो एफ आई आर दर्ज होती है एससी /एसटी या धर्म के नाम पर लेकिन सच यह है कि ज्यादातर केस या तो सुलझते नहीं या पंचायत की चौपाल में ही थम जाते हैं क्या बदल सकती है शहरों की हवाएं जब नर्मदा परिक्रमा करने वाले दलित साधुओं से पूछे जाते हैं कहां से आए हो? जब कलेक्ट्रेट में कोई ओबीसी क्लर्क का अपनी जात छुपा कर नौकरी चाहता है क्योंकि उसे डर महसूस होता है मध्य प्रदेश के गांव शहरों में सामाजिक अत्याचार की आवाज़ हर दिन किसी न किसी गली और स्कूल में उठती है लेकिन मीडिया प्रशासन तथा अतीत शब्द समाज अक्षर इन्हें या तो अंधे का कर देते हैं या यहां ऐसा नहीं होता है कहकर भुला देते हैं लेकिन दोस्त कहानी यहीं खत्म नहीं होती आज भी बहुत से गांव सड़कों पर ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्होंने जात-पात और धर्म की दीवारों को रंग कर दोस्ती शिक्षा और प्रेम की धारा चलाई है पूजा और फातिमा एक ही क्लास में बैठकर अपनी नोटबुक शेयर करती हैं और उन्हें फर्क नहीं पड़ता कौन किस घर से हैं किस जाति से हैं किस धर्म से हैं एक मंदिर के पुजारी ने रमजान में अपने दोस्त के लिए रोज की तरकर आई थी और उसी मोहल्ले में मदरसे में होली का रंग उत्सव मनाया था यह छोटे-छोटे बदलते किस हैं लेकिन बदलाव के सबसे सच्चे प्रतीक है मध्य प्रदेश की सरहद सिर्फ नदियों जंगलों से नहीं बनी यहां के सारे गांव कस्बे स्कूल और मोहल्ले अपने-अपने पूर्वाग्रह और प्रेम दोनों की कहानियों के साथ लेकर चलते हैं अत्याचार भेदभाव और अनदेखी आवाज़ यह देश की सच्चाई है और प्रदेश की भी पर जितनी बार कोई बच्चा दोस्ती के लिए आगे हाथ बढ़ता है कोई शिक्षक सबको एक साथ बैठाते हैं कोई युवा सरनेम के बिना फेसबुक आईडी बनाता है समाज की दीवार की एक ईट कमजोर हो जाती है कभी जबलपुर की गलियों में कभी शिवपुरी की दुकानों में भोपाल की सड़कों पर इंदौर में यूं ही चलते हुए अगर कभी कोई नाम पहचान के सवाल से टकरा जाओ तो हिम्मत करके अपने आप से पूछना क्या मेरे लिए वाकई जात-पात धर्म मजहब इतनी अहमियत रखते हैं अगर जवाब नहीं है तो समझो उनकी अनदेखी आवाज तुम तक पहुंच गई है जहां नाम मजहब के सवाल खत्म होते हैं वहीं से इंसानियत की आवाज शुरू होती है
- निक नागोरिया
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