जाति आधारित अत्याचार: देश, समाज और लोकतंत्र का आईना

असल भारत वो नहीं जो मैट्रो के स्टेशनों के बाहर दिखता है; असल भारत सन से झुलसी उस जमीन में बसता है, जहाँ आज भी जाति की दीवारें सबसे मजबूत हैं, ये लाइनें मैं, आपके सामने रखना चाहता हूँ क्योंकि जाति आधारित अत्याचार कोई बीती हुई दास्तान नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा अधूरा सपना है। हर दिन अखबार के कोनों में, पुलिस थानों की एफआईआर बुक में, पंचायत के गलियारों में, दलित-आदिवासियों की पीड़ा 'न्यू इंडिया' की चादर में छुप-छुपकर सांस लेती है।, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जातियों के खिलाफ पूरे देश में 57582 केस रजिस्टर्ड हुए जिसमें सबसे ज्यादा केस उत्तर प्रदेश 15368 राजस्थान में 8752 तथा मध्य प्रदेश में 7733 केस दर्ज हुए, यही सिर्फ मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति के 2979 मामले रजिस्टर्ड हुए हर घंटे कोई ना कोई दलित पीड़ित होता है लेकिन हर घंटे कोई रिपोर्ट मीडिया में नहीं आती यह कड़वी सच्चाई हैं
एमपी में हर दिन औसतन 7 आदिवासी महिलाओं के साथ रेप हिंसा के मामले सामने आते हैं वर्ष 2022 से 2024 कुल 7418 महिलाओं के केस रिपोर्ट जिसमें 338 गैंगरेप 558 मर्डर तथा 1906 घरेलू हिंसा के मामले दर्ज हुए, मोटा मोटा 60 % मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई शेष महीनों सालों तक फाइलों में दफ़न रहे 17166 केस 2022 तक लंबित यानी इंसाफ से बहुत दूर  रहे हैं, बात करते हैं हाल ही के 13 मई 2025 राजगढ़ कुरावर के एक मामले की जिसमें दो दलित युवकों को भीड़ में नंगा कर मुंह काला किया गया पूरे गांव में घुमाया वजह जमीन के पैसे मांगने का साहस तथा वीडियो बनाया वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट में करवाई दर्ज की मगर शुरू में परिवार को समझौते करने की सलाह दी गई थी, अगर कोई चोरी चुपके वीडियो नहीं बनता और वह वीडियो वायरल नहीं होता तो यह मामला कभी सामने आने वाला ही नहीं था, 2023 देश आजादी के 76 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा देश के लाल किले से लेकर तमाम सरकारी-प्राइवेट दफ्तरों, स्कूलों और भवनों में तिरंगा शान के साथ लहराया गया बच्चों से लेकर बूढ़े तक आजादी के जश्न में डूबे नजर आए. भारत को आजाद हुए 77 वर्ष हो गए थे लेकिन देश में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो अपनी रूढ़िवादी और छोटी मानसिकता से आजादी नहीं पा सके यह सवाल इसलिए क्योंकि ऐसी ही सोच से जुड़ा एक मामला मध्यप्रदेश के विदिशा जिले से सामने आया है. जहां भगवन्तपुर ग्राम पंचायत के सरपंच को तिरंगा नहीं फहराने दिया गया, क्योंकि...क्योंकि वो दलित हैं. सरपंच बारेलाल अहिरवार का कहना है कि "स्कूल की मेडम मुझसे हरिजन होने के कारण चिढ़ती हैं. वो कहती हैं कि तुम दलित हो तुम क्या जानो. आज स्वतंत्रता दिवस पर मुझे स्कूल में नहीं बुलाया. मेडम ने किसी दूसरे व्यक्ति यानि की जनपद सदस्य से तिरंगा फहरवाया. जबकि पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सरपंच को ही झंडा फहराने का अधिकार है.", मध्य प्रदेश के सतना ज़िले की अकौना ग्राम पंचायत का मामला 2024 का है जातिगत भेदभाव का एक चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया है, जहाँ ठाकुर बहुल इलाके की पहली दलित महिला सरपंच को कथित तौर पर लगातार अपमानित किया जा रहा है। यह मामला 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के दिन तब सामने आया जब उन्हें राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोका गया सिर्फ़ उनके महिला होने की वजह से नहीं, बल्कि दलित समुदाय से होने के कारण, 17 अगस्त को ग्राम सभा की बैठक में उन्हें फिर से अपमानित किया गया। बैठक के दौरान जब उन्होंने कुर्सी मांगी तो उपसरपंच और सचिव दोनों ने उन्हें यह कहते हुए मना कर दिया कि, कुर्सी चाहिए तो घर से ले आओ, नहीं तो ज़मीन पर बैठो या खड़ी रहो, मध्यप्रदेश के गुना जिले में लोकतंत्र और पंचायत व्यवस्था को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया था जहां करोद ग्राम पंचायत की दलित महिला सरपंच लक्ष्मीबाई पति शंकर सिंह गौड़ को दबंगों ने पंचायत की सरकारी सील गिरवी रखने को मजबूर किया। आखिर पंचायत चुनाव भी यहां पैसों और रसूख का खेल है। चाचौड़ा-बीनागंज – महिला सरपंच चुनाव जीतती है, दबंग कर्ज देता है, बदले में पंचायत के फैसलों पर दखल। गाँव, पंचायत, प्रशासन सब ताकतवर के इशारे पर।, मध्य प्रदेश में पुलिस, न्यायिक सिस्टम और खूब सजती 'एफआईआर' थाने में जाति आधारित अत्याचार का केस दर्ज होता है। फिर क्या होता है? ज़्यादातर मामले 'मामले को पंचायत में सुलझाने' या 'समझौता करा दो' के नाम पर दबा दिये जाते हैं। समाजिक दबाव, राजनीतिक दबाव, आरोपी के प्रभाव के चलते केस FIR तक आता ही कम है। जिन केसों में FIR दर्ज भी होती है, उनमें भी अकसर अंतिम चार्जशीट या कोर्ट ऑर्डर के लिए कई साल लग जाते हैं।, मध्यप्रदेश में पंचायत और लोकतंत्र – कागज के अधिकार, असलियत का अपमान पंचायत स्तर पर दलित या महिला सरपंच को अक्सर दर्शाया जाता है कि वो 'मुखिया' हैं, मगर ताकत आज भी इक्का-दुक्का परिवारों/समाज के सर्वेसर्वा के पास। 'रिजर्व सीट' का सपना सिर्फ़ आरक्षण की सूची तक, असल फैसले गाँव की गली और ठाकुरजी के दरवाजे पर होते हैं। 'झंडा फहराने का अधिकार' तक छीन लिया जाता है। और ये सब पुलिस एफआईआर में नहीं दिखता, यह सिर्फ़ इंसान की आत्मा और उसकी आवाज़ में दिखेगा। मध्यप्रदेश में सिस्टम का जवाब? – सरकारी योजनाएँ और उनकी हकीकत कैसी विडम्बना! केंद्र और राज्य सालों से करोड़ों रुपये राहत, पुनर्वास, आर्थिक सहायता, जागरूकता जैसे कामों के लिए भेजते हैं। मगर... पंचायत में दबंग परिवार राहत पैसा भी हड़प लेते हैं। अनेक मामलों में पीड़ित परिवार गरीब/अनपढ़ होने के कारण, पेपरवर्क-पंचायत के झमेले में राहत राशि प्राप्त ही नहीं कर पाता। पुलिस थाने और सरकारी कार्यालय में कई बार पीड़ित से ही 'पैसा' मांगा जाता है – और ये भी परंपरा बन गई है।, सोशल मीडिया, वायरल वीडियो और सिस्टम की असहायता 'पुलिस केस' तभी दर्ज होता है जब घटना का वीडियो वायरल हो, या कोई मीडिया प्लेटफार्म ट्वीटर-फेसबुक पर उबाल लाए। इससे पहले – या तो पीड़ित खुद अपराधी बना दिया जाता है, या फिर उसे गांव छोड़ने पर मजबूर किया जाता है। गरिमा, सम्मान, न्याय – तीनों सिर्फ संविधान की किताब में बचा है।, अब आंकड़े, असर और असली सवाल सरकार कहती है – "हमने कानून बना दिये, राहत निधि दे दी, फास्ट ट्रैक कोर्ट खोल दी, SC/ST एक्ट संशोधित हो गया, मग़र पीड़ित कब तक न्याय का इंतज़ार करेगा? 2023 में 60% केस में भी चार्जशीट नहीं दाखिल। 2025 में पंचायत स्तर पर डकैती, तिरंगा अपमान, सार्वजनिक बेइज्जती के केस बेखौफ पुलिस, प्रशासन, समाज – तीनों की चुप्पी सबसे बड़ी सजा।, मीडिया, रिपोर्टिंग और असल भारत बड़े चैनलों पर अक्सर जातीय दंगों, आरक्षण की राजनीति और दलितों की सियासत पर लंबी बहसें होती हैं। मगर आज ग्राउंड पर असली रिपोर्टर वही है—जो गाँव के चौराहे पर, पंचायत के दरवाजे पर, पुलिस थाने की फाइल में पड़ी पीड़ित की फरियाद को पढ़ लेता है। 'मूकनायक', 'दलित दस्तक', 'द्रष्टि IAS' जैसे स्वतंत्र मीडिया पोर्टल, या फिर लोकल संवाददाता—इनकी रिपोर्टों से असली लोकतंत्र की 'कब्र' सच में दिखती है। 50,000 शब्दों की जगह – 50 सवालों से टक्कर क्या हम उस समाज में रहना चाहते हैं जहाँ हर दिन जाति के नाम पर अपमान होता रहे? क्या पुलिस से ज़्यादा पंचायत का पंचायत राज चलेगा? क्या संविधान की किताब को हर पंचायत में पढ़ाया जाएगा या झंडा फहराने तक सीमित रह जाएगा? क्या यह देश केवल कागज पर लोकतंत्र है, या असलियत में भी?" जवाब आपके पास है, वैसे ही जैसे… सिस्टम में फंसी हर फाइल, हर पीड़ित की फरियाद और हर आवाज जिसे बार-बार 'कमीनी जाति', 'गरीब', 'दलित' कहकर, हँसकर, नजरअंदाज कर दिया जाता है।
ये सोर्स भारत सरकार गृह मंत्रालय, NCRB, मूकनायक, डेली मीडिया रिपोर्ट, दीपग्राउंड गाँव, पंचायत, स्वतंत्र पत्रकार–हर प्रमाण फाइल, हर केस, हर पीड़ित के आँसू...)
नोट: यह पूरा आलेख सरकारी, स्वतंत्र रिपोर्ट, थानों की एफआईआर और ग्राउंड रिपोर्ट पर आधारित है। यहाँ हर घटना, हर आंकड़ा, हर पंचायत, हर फरियादी और हर वेदना को सवाल, साक्ष्य और समाज की नंगी सच्चाई के साथ लिखा गया है। शब्द सीमा चाहे 50,000 हो या एक करोड़, जब तक इंसाफ़ नहीं, तब तक ये ब्लॉग अधूरा ही रहेगा। "जिन्हें न्याय मिल जाता है, वो सिस्टम की तारीफ करते हैं। जिनका मामला सिर्फ आंकड़ों में रह जाता है, उनकी आवाज़ रात के अंधेरे में भी गूँजती है।"

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