ब्राह्मणवाद बनाम बहुजनवाद

ब्राह्मणवाद बनाम बहुजनवाद


भारत एक ऐसा देश है जहाँ परंपराएँ, संस्कृति, और समाज की संरचना सदियों से कई बदलावों के साथ आगे बढ़ती रही है। यहाँ के समाज को समझने के लिए, उसकी जड़ों में छुपे हुए विचारधाराओं का विश्लेषण करना जरूरी है। उन विचारधाराओं में सबसे गहरा संघर्ष, ब्राह्मणवाद और बहुजनवाद का रहा है। ये दोनों विचारधाराएँ केवल शब्द नहीं बल्कि वह धरातल हैं, जहाँ समाज की सोच, उसकी नीतियाँ, और उसका भविष्य आकार लेता है। जिन घरों, गलियों, खेतों, मंदिरों, स्कूलों, और दफ्तरों में हम रहते हैं, वहाँ जाति की बात करना आम है। “कौन, किसके घर पैदा हुआ?”—यह सवाल आज भी भारत के गाँवों और शहरों में रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा है। यहाँ तक कि हमारी शिक्षा, नौकरी, शादी, राजनीति, और धर्म के हर स्तर पर जाति और उसकी विचारधाराएँ असर करती हैं। इन्हीं विचारधाराओं के टकराव में देश का सबसे ऐतिहासिक और जटिल सवाल आते है "ब्राह्मणवाद बनाम बहुजनवाद"।

ब्राह्मणवाद केवल ब्राह्मण जाति के लोगों का विषय नहीं है, बल्कि उन विचारों, परंपराओं और माध्यमों का समूह है जिनकी नींव ऊँच-नीच की भावना पर टिकी हुई है। यह विचारधारा समाज को दो हिस्सों में बाँट देती है – एक तरफ वे लोग जिन्हें 'ऊँचा' कहा गया और दूसरी ओर वे जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी 'नीच' माना गया। ब्राह्मणवाद सत्ता, धर्म, शिक्षा और समाज के सभी स्तरों पर ब्राह्मणों की प्राथमिकता और सर्वोच्चता को बढ़ावा देता आया है। बहुजनवाद उन सबकी आवाज है जिनकी पहचान, अस्तित्व और मान-सम्मान ब्राह्मणवादी सोच ने हमेशा दबाने की कोशिश की। चाहे वे दलित हों, आदिवासी हों, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या अन्य तबका, बहुजनवाद उनकी सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक हिस्सेदारी की मांग है। बहुजनवाद कहता है कि “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”, यानी बहुसंख्यक समाज का भला। जमीनी स्तर पर देखें तो ब्राह्मणवाद बनाम बहुजनवाद का संघर्ष केवल किताबों और अखबारों में नहीं है। हर गाँव, हर बस्ती, हर सामाजिक कार्यक्रम या सरकारी दफ्तर में इन दोनों विचारधाराओं का सीधा टकराव है। आज भी कई जगह बहुजनों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। जमीन पर मालिकाना हक, सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी या पंचायत चुनाव में आरक्षण—इन सबमें बहुजन समाज को अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। राजनीति में जिनका बहुमत है, वही अक्सर सत्ता से दूर रखे जाते हैं। गांवों-कस्बों में आज भी कई बार दलितों से छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार, और दबंगई की खबरें आती हैं।

ब्राह्मणवाद और बहुजनवाद का मुद्दा सिर्फ बड़े-बड़े विद्वानों की चिंता नहीं, बल्कि गाँव के आम किसान, शहरी मजदूर, और वहाँ पढ़ रहे बच्चे का भी है। जब किसी बहुजन समाज के लड़के या लड़की को स्कूल में सीट नहीं मिलती, किसी दलित को सार्वजनिक कुंए से पानी भरने नहीं दिया जाता, या गांव की पंचायत में आदिवासी नेता के चुनाव जीतने पर उत्सव मनाया जाता है—ये सब उसी संघर्ष की निशानियाँ हैं। आज जब देश डिजिटल युग में पहुंच चुका है, शिक्षा और रोजगार में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, सामाजिक न्याय और अधिकारों की बातें हो रही हैं, तब भी जमीनी सच यही है कि बहुजन समाज को बराबरी और सम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है। इसीलिए ब्राह्मणवाद और बहुजनवाद की चर्चा आज की जरूरत है ताकि हम समाज में सच्ची समानता और लोकतंत्र के उद्देश्य को समझ और लागू कर सकें।

इस ब्लॉग में आज हम गहरी बात करेंगे कि इतिहास की गहराइयों में जाकर ब्राह्मणवाद के उद्भव और उसके समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को समझेंगे, बहुजनवाद के आंदोलन, उसकी जरूरत और उसकी सामाजिक-राजनीतिक बुनियाद को जानेंगे, दोनों विचारधाराओं के संघर्ष के ज़मीनी उदाहरण और तथ्यों से टकराएंगे, शिक्षा, रोजगार, राजनीति, संस्कृति, और रोज़मर्रा की जिंदगी में इन दोनों विचारधाराओं के असर को देखेंगे, और सबसे आखिर में कोशिश करेंगे कि भारतीय समाज में बराबरी और न्याय की राह कैसी बन सकती है। आखिरकार सवाल यही है, कि समाज किस दिशा में बढ़ेगा – पुरानी ऊँच-नीच वाली सोच की तरफ, या एक न्यायपूर्ण, बराबरी और बहुजन-हितैषी भारत की तरफ? कैसे पनपा ब्राह्मणवाद और कैसे शुरू हुआ बहुजन संघर्ष- भारत हजारों साल पुरानी सभ्यता है। यहाँ समाज की जटिलता सबसे अलग है—कहीं नदियों के किनारे खेती करने वाले लोग हैं, तो कहीं जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय हैं। सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि भारतीय समाज को शुरू में किसी धर्म या जाति की दीवार ने नहीं बाँधा था। लोग अपने काम से पहचाने जाते थे—किसी का पेशा खेती, तो किसी का पशुपालन या शिल्पकारी। लेकिन जैसे-जैसे समाज बड़ा हुआ, लोगों के बीच काम के मुताबिक बँटवारा होने लगा। यही बँटवारा धीरे-धीरे समाज में ऐसी दीवारें खड़ी कर गया, जो बाद में जातियां कहलाने लगीं।

भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था का जिक्र सबसे पहले ऋग्वेद (लगभग 1500 ईसा पूर्व) में मिलता है। वहाँ ‘पुरुष सूक्त’ के तहत चार वर्णों की बात आई है—ब्राह्मण: जो धार्मिक कर्मकांड और शिक्षा का काम करें,क्षत्रिय: जो शासन, सुरक्षा और युद्ध करें, वैश्य: जिनका काम व्यापार और खेती हो, शूद्र: सेवा करने वाले, जिनका काम बाकी समाज की मदद करना हो।  शुरुआत में ये सामाजिक बँटवारे पेशा आधारित थे, यानी जो जो काम करेगा, उसका वही वर्ण। पर धीरे-धीरे यह जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगा, यानी जो ब्राह्मण के घर पैदा हुआ, वही ब्राह्मण। समय के साथ-साथ ब्राह्मण वर्ण सबसे ऊपर स्थापित हो गया। धर्म, शिक्षा और समाज के नियम बनाने का अधिकार ब्राह्मणों के पास आ गया। उन्होंने अपने लिए खास नियम बना लिए—जैसे केवल ब्राह्मण ही वेद पढ़ और सिखा सकता है, ब्राह्मणों को सबसे ज़्यादा सम्मान मिलेगा, शुद्ध भोजन मिलेगा, आदि। धीरे-धीरे ब्राह्मणवादी सोच ने यह मान लिया कि बाकी सब वर्णों से ब्राह्मण जन्म से श्रेष्ठ है। मनुस्मृति जैसी किताबों ने इन नियमों को और पक्का किया, जिससे समाज में ऊँच-नीच, छुआछूत, और भेदभाव बढ़ता चला गया। ब्राह्मणवाद ने धीरे-धीरे समाज में ऐसे कई रस्मों-रिवाज पैदा किए जो बहुजनों, खासकर शूद्रों और दलितों, के ख़िलाफ़ थे। जैसे— शूद्रों को मंदिरों में घुसने की मनाही, वेद-पाठ, शिक्षा से दूर रखना, गाँवों की सीमा से बाहर बसाना, जातीय पेशों में बाँध देना ऐसा करके ब्राह्मण सिर्फ धर्म ही नहीं, शिक्षा, आर्थिकी, संस्कृति और न्याय—सभी पर अपनी पकड़ मजबूत करते गए। इसका असर यह हुआ कि निचली जातियों को तरक्की के सारे रास्ते बंद कर दिए गए।
बहुजन संघर्ष की शुरुआत पर बहुजन समाज (यानी OBC, SC, ST, और अन्य पिछड़ी जातियां) ने भी इस अन्याय के आगे सिर नहीं झुकाया। शुरू से ही कई विद्रोही आवाजें उभरीं— महात्मा फुले (19वीं सदी): जिन्होंने सत्यशोधक समाज बनाया और ब्राह्मणवादी ऊँच-नीच के खिलाफ अलख जगाई। सावित्रीबाई फुले: जिन्होंने बहुजन लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। डॉ. भीमराव अंबेडकर: जिन्होंने संविधान में छुआछूत, भेदभाव को खत्म किया और आरक्षण नीति लागू कराई। पेरियार (दक्षिण भारत): इन्होंने ब्राह्मणवाद व वर्णव्यवस्था के खिलाफ ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ चलाया। 
जमीनी उदाहरण देखे तो आज भी कई गांवों में अभी भी मंदिरों में दलितों का प्रवेश वर्जित है। पर दूसरे कई जगह बहुजन समाज ने मंदिर अपने लिए बनवाए और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती दी। महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में बहुजन आंदोलनों से पंचायत स्तर पर दलितों का नेतृत्व बढ़ा। पढ़ाई-लिखाई में बहुजन बच्चों ने रिकॉर्ड तोड़ कर दिखाया—जैसे उत्तरप्रदेश का कोई दलित परिवार पहली बार कॉलेज पहुँचा, तो पूरे गाँव में चर्चा बनी! जमीन के मालिकाना हक के लिए बड़े आंदोलनों की मिसालें जैसे महाराष्ट्र का ‘सत्यशोधक समाज आंदोलन’, या बिहार का ‘नक्सल आंदोलन’ आदि सीधे ब्राह्मणवादी जकड़ के खिलाफ बगावत थे। आजादी के बाद संविधान ने सबको बराबरी के अधिकार दिए। सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण लागू किया गया। बहुजन समाज ने तेजी से तरक्की करनी शुरू की, राजनीति में अपनी आवाज बुलंद की। बसपा, सपा, राजद जैसी पार्टियों का जन्म हुआ, जिन्होंने बहुजन हित के लिए बड़े-बड़े आंदोलन किए। मगर समाज में ब्राह्मणवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज भी जातीय अपराध, छुआछूत और भेदभाव के मामले सामने आते हैं चाहे कितनी भी सरकारी योजनाएँ या कानून लागू हो जाएं। इतिहास से साफ है—जहाँ ब्राह्मणवाद ने समाज को बाँटा, वहीं बहुजनवाद ने उस बंटवारे के बिरोध में आवाज उठाई। गाँव-शहर की जमीनी हकीकत यह है कि आम लोग बेहतर जिंदगी चाहते हैं, मगर जाति की दीवारें लगातार टकराव पैदा करती हैं। अब सवाल यही है—इतने सालों के संघर्ष के बाद क्या हम अपने समाज को वाकई बराबरी के मुकाम तक पहुँचा पाए? या फिर आज भी ब्राह्मणवाद-बहुजनवाद का संघर्ष हर गाँव, स्कूल, राजनीति और धार्मिक जगह पर मौजूद है? ब्राह्मणवाद ने सबसे ज्यादा असर हमारे समाजिक ताने-बाने पर डाला। जाति आधारित ऊँच-नीच को “धार्मिक सत्य” के रूप में पेश किया गया। शादी-ब्याह, खाना-पीना, रहन-सहन—हर चीज में जाति की दीवार खड़ी की गई। “शुद्ध” और “अशुद्ध” के नाम पर छुआछूत की परंपरा कायम रही। शिक्षा का अधिकार सिर्फ ऊँची जातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया। उत्तर प्रदेश के कई गांवों में आज भी दलितों को शादी में घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता। मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में आंगनवाड़ी में बच्चों को जाति देखकर अलग बैठाया जाता है, ब्राह्मणवाद का असर यह हुआ कि बहुजनों को आर्थिक संसाधनों से वंचित रखा गया।
ज़मीन का मालिकाना हक ऊँची जातियों के पास केंद्रित रहा। बहुजनों को सिर्फ श्रम आधारित और कम मेहनताना वाले काम दिए गए। गाँव में जल स्रोत, खेती की जमीन, व्यापार सब पर ऊँची जातियों का कब्ज़ा। बिहार और राजस्थान में दलित परिवार आज भी ऊँची जातियों के खेतों में मजदूरी करते हैं, लेकिन जमीन उनके नाम नहीं होती। कई बहुजन महिलाओं को सिर्फ ऊँची जातियों के घरों में ‘मेहनत मजदूरी’ करने का विकल्प मिलता है। ब्राह्मणवाद ने राजनीति पर भी असर डाला, ताकि सत्ता पर कुछ ही जातियों का कब्ज़ा रहे।  पंचायत से लेकर संसद तक, लंबे समय तक उच्च जातियों का वर्चस्व रहा। बहुजन समाज को चुनाव लड़ने, जीतने और शासन में आने से रोकने के लिए कई सामाजिक और प्रशासनिक बाधाएँ खड़ी की गईं। जो बहुजन नेता आगे आए, उन्हें भी बड़े पदों पर पहुंचने से रोकने की कोशिशें की गईं। पंचायत चुनाव में आरक्षण लागू होने के बावजूद, कई जगह दलित सरपंच को कामकाज में “प्रॉक्सी” बनाकर ऊँची जातियां ही फैसले लेती हैं। कई बार बहुजन नेताओं को धमकी देकर इस्तीफा देने पर मजबूर किया जाता है। धार्मिक किताबों, लोककथाओं और रिवाजों में ऊँची जातियों को आदर्श और निचली जातियों को हीन दिखाया गया। बहुजन समाज की भाषा, पहनावा और कला को ‘छोटा’ साबित किया गया, जबकि ब्राह्मणवादी परंपराओं को ‘श्रेष्ठ संस्कृति’ घोषित किया गया। दलित और आदिवासी देवी-देवताओं की पूजा को कई बार ‘ग़ैर-आधिकारिक’ या ‘लोक-कथाओं’ तक सीमित बताया गया। स्कूल के पाठ्यक्रम में बहुजन नायकों का जिक्र बहुत कम होता है, जबकि राजाओं और ब्राह्मण विद्वानों का महिमामंडन होता है। सामाजिक असमानता ने बहुजन समाज को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछड़ा रखा। आर्थिक संसाधनों से वंचित रखने के कारण गरीबी की चक्की में पिसते रहे। राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी ने ताकतवर नीतियां बनाने से रोका।
ब्राह्मणवाद का असर गहरा और बहुआयामी रहा—यह केवल जाति का मसला नहीं, बल्कि सत्ता, संस्कृति, जमीन, शिक्षा और अवसरों पर नियंत्रण का खेल है। इसे समझे बिना, बहुजन समाज की समस्याओं का सही समाधान संभव नहीं। 

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